कोरोना महासंकट के दौर में बेहद प्रासंगिक है भगवान महावीर का दर्शन

भगवान महावीर की जन्म जयन्ती मनाते हुए हमें महावीर बनने की तैयारी करनी होगी, हम महावीर को केवल पूजें ही नहीं, बल्कि उनको जीयें तभी महावीर जयन्ती मनाने की सार्थकता है। उन्होंने जो शिक्षाएं दीं, वे जन-जन के लिये अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य एवं निराशा से आशा की ओर जाने का माध्यम बनी। इसलिये भी जैन धर्म के अनुयायियों ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिये उनकी जन्म-जयन्ती मनाने का महत्व है। महावीर लोकोत्तम पुरुष हैं, उनकी शिक्षाओं की उपादेयता सार्वकालिक, सार्वभौमिक एवं सार्वदेशिक है, दुनिया के तमाम लोगों ने इनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा ली है। सत्य, अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह ऐसे सिद्धान्त हैं, जो हमेशा स्वीकार्य रहेंगे और विश्व मानवता को प्रेरणा देते रहेंगे। महावीर का संपूर्ण जीवन मानवता के अभ्युदय की जीवंत प्रेरणा है। लाखों-लाखों लोगों को उन्होंने अपने आलोक से आलोकित किया है। इस वर्ष भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति घोषित की है, यह समय कोरोना महासंकट का समय है, ऐसे समय में महावीर की शिक्षाओं को अपना कर हम हमारी शिक्षा नीति को परिपूर्णता प्रदत्त कर सकते है एवं कोरोना महासंकट से मुक्ति पा सकते हैं।भगवान महावीर की जन्म जयन्ती हम जैसों के लिये जागने की दस्तक है। उन्होंने बाहरी लड़ाई को मूल्य नहीं दिया, बल्कि स्व की सुरक्षा में आत्म-युद्ध को जरूरी बतलाया। उन्होंने जो कहा, सत्य को उपलब्ध कर कहा। उन्होंने सबके अस्तित्व को स्वीकृति दी। ‘णो हीणे णो अइरित्ते’- उनकी नजर में न कोई ऊंचा था, न कोई नीचा। उनका अहिंसक मन कभी किसी के सुख में व्यवधान नहीं बना। महावीर का यह संदेश जन-जन के लिये सीख बने- ‘पुरुष! तू स्वयं अपना भाग्यविधाता है।’ औरों के सहारे मुकाम तक पहुंच भी गए तो क्या? इस तरह की मंजिलें स्थायी नहीं होतीं और न इस तरह का समाधान कारगर होता है। यह सीख भारत की नवपीढ़ी विशेषतः छात्रों के लिये जीवन-निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकती है।