देव दीपावली : 1986 में जले थे काशी में पहले दीप

धर्म/अध्यात्म (Rashtra Pratham) :- त्रिपुर नाम के दुर्दांत असुर पर भगवान शिव की विजय गाथा की पौराणिक कथा को जानने वाली कुछ श्रद्धालु महिलाएं कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा घाटों तक आती थीं और श्रद्धा के कुछ दीप जला कर वापस लौट जाती थीं। काशी में चौदहवीं सदी से ही इस ‘देव विजय’ के उपलक्ष्य में घाट किनारे राजे-महाराजों की ओर से राजकीय स्तर पर भव्य दीपोत्सव मनाए जाने के दृष्टांत तब तक लान मारकीन में बंधी पोथियों में ही कैद थे। ऐसे में एक अगमजानी (दूरदर्शी) युवक ने अपनी कल्पनाओं को अनंत उड़ान दी। पौराणिक पृष्ठों को पलटा और मजबूत इरादों के साथ जुट गया अतीत में काशी के गौरव रहे देवदीपावली उत्सव को फिर एक बार जमीन पर उतारने के काम में।

यह नौजवान थे आज के उत्सव के सबसे पहले दृष्टा नारायण गुरु।सामाजिक कार्यकर्ता एवं गीतकार कन्‍हैया दुबे केडी बताते हैं कि- आयोजन के दौरान सबसे पहले एक से दो-दो से चार और चार से आठ हुए। इसके बाद केंद्रीय देव दीपावली समिति का गठन काशी में हुआ। वर्ष 1986 में पंचगंगा सहित कुल छह घाट जब दीप मालाओं से जगमगाए तो नगर में उल्लास की एक नई लहर महसूस की गई। हालांकि, यह आयोजन ‘आन क आटा-आन क घी, करें परोजन बाबा जी (जुगाड़ी- जुटान) की तर्ज पर ही हुआ। अगले साल उत्सव को श्री मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य का प्रोत्साहन और संरक्षण मिला। कई घाटों ते तेल-दीया-बाती पंहुचाई गई और इस बार आलोकित हुए गंगा का शृंगार करते कुल 12 घाट ही।

वर्ष 1988 तक उत्सव 24 घाटों तक विस्तार ले चुका था।वर्ष 1989-90 में शहर की शांति व्यवस्था ठीक न होने की वजह से उत्सव प्रभावित हुआ। 1991 में दिव्य कार्तिक मास महोत्सव के अंर्तगत स्वामी रामनरेशाचार्य ने उत्सव को एक बार फिर खड़ा किया। वर्ष 1994 तक तो पं.किशोरी रमण दूबे (बाबू महाराज) तथा पं. सत्येंद्र नाथ मिश्र और उनके सहयोगियों ने उत्सव की भव्यता के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कि बनारस के घाटों का यह उत्सव देश की सीमाओं को लांघ कर अंर्तराष्ट्रीय फलक पर छा गया। इस श्रेय से उन उत्साही नौजवानों का हिस्सा ‘बाद’ नहीं किया जा सकता जिन्होने फरुहे -बेलचों से घाट की मिट्टी हटाने से ले कर दीया जलाने तक का काम अपने कंधों पर ले कर अपने-अपने घाटों को नई पहचान दिलाई।