प्रभु को कंधे पर बैठाने से पहले श्रीराम और हनुमानजी का सुंदर वार्तालाप

विगत अंकों की लड़ियों में हम श्री हनुमान जी के परहितकारी व सौम्य हृदय की सुंदर वार्ता से निकल नहीं पा रहे हैं। मानो प्रत्येक अंक के साथ हमें उनके दिव्य चरित्र में नित नया हृदय स्पर्शी व आविष्कारिक बिंदु हाथ लगता है। और उस बिंदु में झांकने भर से हमें असंख्य सिंधु समाये प्रतीत होते हैं। अभी भी जब उन्हें लगा कि प्रभु श्रीराम जी को अब सुग्रीव से मिलने में विलंब नहीं करना चाहिए तो श्री हनुमान जी दोनों भाइयों को अपनी पीठ पर सवार होने की विनती करते हैं। कारण कि सुग्रीव तक पहुंचने के लिए प्रभु को पहाड़ी के शिखर पर ले जाना था। जिसे देख प्रभु असमंजस की स्थिति में पड़ गए कि अरे वाह! एक तो भक्त आप हुए जो स्वयं पहाड़ी से नीचे उतर कर हमारे पास आ पहुंचे। ठीक वैसे ही अगर सुग्रीव भी हमारे दास हैं तो वे भी स्वयं नीचे उतर कर हमारे पास क्यों नहीं आये? आपने कहा कि वे दीन भी हैं तो दीन तो अपने दुःख के उपचार हेतु कहीं न कहीं जाता ही है न। तो क्यों न वह हमारे पास ही आ जाता? श्री हनुमान जी ने सुना तो हाथ जोड़ कर बोले− ‘प्रभु! आप का कहना श्रेयस्कर है किसी दीन दुखी को निश्चित ही ऐसा करना चाहिए। सो अपने प्रसंग में मैंने वही किया। आप के पास दौड़ा चला आया। लेकिन प्रभु मुझे मेरे अपराध के लिए क्षमा करें। कृपया यह बतायें जो जीव दर्द व कलह से इस हद तक संतप्त हो कि टांगें संपूर्ण शरीर का भार तो छोड़िए स्वयं अपना भार भी न उठा पाएं और हिलने−डुलने में भी विवश हो जाएं। तो क्या उक्त व्यक्ति से यह कामना करनी व्यर्थ नहीं होगी कि वह स्वयं आप तक चलकर आए? दुःख हर्ता को तो स्वयं उसके पास अविलंब जाना चाहिए। तभी तो दुखहर्ता की महानता है। और प्रभु आप तो निश्चित ही बहुत समय पहले से यह करना चाह रहे थे। बस मैंने ही व्यर्थ की बातों में समय नष्ट कर दिया। तो क्या प्रभु हमें चलना चाहिए न? क्योंकि आपको विलंब जो हो रहा है।’

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