कल है दशहरा, जानें विजयादशमी पूजा एवं शस्त्र पूजा मुहूर्त

 बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा कल 15 अक्टूबर दिन शुक्रवार को है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार दशहरा या विजयादशमी का त्योहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 15 अक्टूबर को है। दशहरा के दिन लंका के राजा रावण, भाई कुंभकर्ण एवं पुत्र मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। देशभर में होने वाली रामलीलाओं का अंतिम दिन भी दशहरा को ही होता है। पुतला दहन के साथ रामलीलाओं का समापन होता है। बंगाल, बिहार समेत देश के कई राज्यों में दुर्गा पूजा का भी समापन विजयादशमी के दिन होता है, हालांकि मां दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन मुहूर्त पर निर्भर करता है। आइए जानते हैं कि दशहरा पर विजयादशमी पूजा एवं शस्त्र पूजा का मुहूर्त और इसका महत्व क्या है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी का प्रारंभ आज 14 अक्टूबर को शाम 06:52 बजे से हो रहा है, जो 15 अक्टूबर दिन शुक्रवार को शाम 06:02 बजे तक है। ऐसे में दशहरा या विजयादशमी का पावन पर्व 15 अक्टूबर को मनाया जाएगा।अपने देश में विजयादशमी के पावन पर्व पर शस्त्र पूजा की भी परंपरा है। इस वर्ष विजयादशमी पर शत्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 02:02 बजे से दपेहर 02:48 बजे तक है। इस मुहूर्त में आप शस्त्र पूजा कर सकते हैं। सर्वार्थ सिद्धि योग में भी कर सकते हैं।इस वर्ष विजयादशमी का पावन पर्व सर्वार्थ सिद्धि योग और रवियोग में है। सर्वार्थ सिद्धि योग प्रात: 06:22 बजे से सुबह 09:16 बजे तक और रवि योग पूरे दिन है। ऐसे में आप विजयादशमी की पूजा सर्वार्थ सिद्धि योग में करें तो उत्तम है। हालांकि दशहरा को अभिजित मुहूर्त दिन में 11:44 से दोपहर 12:30 बजे तक है। इसमें भी आप पूजा कर सकते हैं। लेकिन सर्वार्थ सिद्धि योग में पूजा अच्छा रहेगा। विजयादशमी के दिन देवी अपराजिता की पूजा होती है।

दशहरा का महत्व

भगवान श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता का हरण करने वाले लंका के राजा रावण का वध आश्विन शुक्ल दशमी को किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार भीषण युद्ध के बाद दशमी को रावण का वध हुआ और श्रीराम ने लंका विजय प्राप्त की, इसलिए इस दिन को विजयादशमी या दशहरा के रुप में मनाया जाता है। वहीं, मां दुर्गा ने महिषासुर के साथ 10 दिनों तक भीषण संग्राम किया और आश्विन शुक्ल दशमी को उसका वध कर दिया। इस वजह से भी उस दिन को विजयादशमी के रुप में मनाया जाने लगा। ये दोनों ही घटनाएं बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक हैं।