जब पत्नी के लिए घर में नहीं छोड़ा था कोई सरकारी वाहन

इस बात की चर्चा पहले भी अलग-अलग मंचों पर कई बार हो चुकी है कि मनमोहन सिंह ने अपने जीवन के प्रारंभिक 12 साल ऐसे गांव में गुजारे जहां न बिजली थी, न नल, न स्कूल और न अस्पताल। गांव से दूर स्थित एक सरकारी स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की, जिसके लिए उन्हें रोजाना मीलों तक पैदल चलना पड़ता था। रात को केरोसि‍न लैंप की रोशनी में वे पढ़ाई करते। लेकिन यह बात कम ही लोगों को मालूम होगी कि जब भी उन्हें हिंदी में भाषण देना होता है तो वह भाषण हिंदी में लिखा हुआ नहीं, बल्कि उर्दू में लिखा होता है। क्योंकि उन्होंने जिस स्कूल में प्रारंभिक पढ़ाई की थी, वह उर्दू माध्यम का स्कूल था। इससे उर्दू ही उनकी पहली जुबान बन गई। एक सवाल के जवाब में उन्होंने यह भी बताया था कि लैंप के मद्धिम प्रकाश में पढ़ने से उनकी आंखें इतनी कमजोर हो गईं कि वे बड़े अक्षरों में ही लिखा हुआ भाषण ही पढ़ पाते हैं।एक घटना बताती है कि मनमोहन सिंह की सादगी में उनकी धर्मपत्नी की सादगी का कितना बड़ा हाथ रहा है। या हो सकता है मनमोहन सिंह की सादगी ने ही उनकी धर्मपत्नी को सादगी के साथ रहने को प्रेरित किया हो। सच जो भी हो, यह घटना काफी रोचक है जो उनके वित्त मंत्री के कार्यकाल की है। उस समय मनमोहन सिंह को ‘फिक्की’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर वक्ता भाग लेना था। इस कार्यक्रम में उनकी धर्मपत्नी गुरशरण कौर को भी आमंत्रित किया गया था। मनमोहन सिंह तो सीधे अपने कार्यालय से कार्यक्रम स्थल के लिए रवाना हो गए। गुरशरण कौर को लेने एक उप सचिव उनके घर पहुंचे। स्वाभाविक रूप से इस अधिकारी को लगा था कि भारत के वित्त मंत्री के घर पर तो कई सरकारी वाहन होंगे, जिसमें से किसी एक से वह वित्त मंत्री की पत्नी को आयोजन स्थल तक ले जाएंगे। लेकिन घर पहुंचकर वे आश्चर्यचकित रह गए, जब वित्त मंत्री की धर्मपत्नी ने बताया कि मंत्रीजी ने अपने पास केवल एक ही सरकारी वाहन रखा है, जिसका उपयोग वे स्वयं करते हैं। इससे सरकारी अधिकारी को यह सोचकर ग्लानि होने लगी कि वह खुद अच्छी सरकारी गाड़ी क्यों नहीं लाया। लेकिन गुरशरण कौर सहज बनी रहीं। उन्होंने मुस्काते हुए अधिकारी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे चाहें तो उनकी मारुति 800 कार को ड्राइव कर उन्हें आयोजन स्थल तक पहुंचा सकते हैं।साल 1985 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे,उस दौरान मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। प्रधानमंत्री होने के नाते राजीव योजना आयोग के अध्यक्ष थे। मनमोहन और राजीव के रिश्तों के बारे में पूर्व गृह सचिव सीजी सोमैया ने अपनी आत्मकथा ‘द ऑनेस्ट ऑलवेज स्टैंड अलोन’ में एक घटना का जिक्र किया। राजीव ने तब मनमोहन के नेतृत्व वाले योजना आयोग को ऐसे ‘जोकरों का गिरोह’ करार दिया था, जो विकास के किसी भी नए विचार को रद्द कर देता था। इससे मनमोहन सिंह इतने दुखी हुए कि योजना आयोग से इस्तीफा देने पर उतारू हो गए। सोमैया अपनी किताब में लिखते हैं, ‘मैं एक घंटे उनके पास बैठा और समझाया कि इस तरह का अतिवादी कदम न उठाएं और प्रधानमंत्री की बात को उनकी नासमझी बताया।’ सोमैया की इस सलाह पर मनमोहन सिंह ने योजना आयोग तो नहीं छोड़ा, लेकिन राजीव गांधी के दौर में वे हाशिये पर ही रहे और उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भेज दिया गया। फिर 22 जून, 1991 को वह पल भी आया जब वे बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित यूजीसी के अपने कार्यालय में बैठे हुए थे। उसी समय उनके लिए फोन आया। उसी दोपहर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले पीवी नरसिम्हा राव लाइन पर थे। उन्होंने मनमोहन से कहा, ‘तुम वहां क्या कर रहे हो? घर जाओ और तैयार होकर सीधे राष्ट्रपति भवन आ जाओ।’ इसके दो दिन बाद यानी 24 जून, 1991 को मनमोहन सिंह ने देश के केंद्रीय वित्त मंत्री की हैसियत से आर्थिक सुधारों की घोषणा की।