हिटलर एंड इंडिया- हिटलर की नजर में भारत की छवि

देश के रेलवे स्टेशनों पर पुस्तक भंडार में किताबें देखने व खरीदने के शौकीन लोगों को यह मालूम है कि ढेर सारी लोकप्रिय रचनाओं के साथ वहां जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘माइन काम्फ’ (मेरा संघर्ष) की प्रति जरूर मिल जाएगी। भारत में यह बेस्टसेलर की सूची में शामिल है। लेकिन क्या हमें पता है कि हिटलर भारत के स्वतंत्रता संग्राम, उसकी सभ्यता, संस्कृति और उसके भविष्य के बारे में क्या सोचता था? अधिकांश भारतीय यही समझते हैं कि हिटलर भारत को अपना दोस्त मानता था और उसके स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करता था।बहरहाल, सच्चाई इससे कोसों दूर है।

सामान्य मानवी की तो छोड़िए, पढ़े-लिखे लोग भी भारत के बारे में हिटलर की राय से परिचित नहीं हैं। जर्मन तानाशाह की भारत के बारे में राय को लेकर प्रामाणिक सामग्री की कमी को पत्रकार एवं इतिहासकार वैभव पुरंदरे ने अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘हिटलर एंड इंडिया’ के जरिये दूर करने की कोशिश की है और कहना न होगा कि इस प्रयास में वह काफी हद तक सफल रहे हैं। ‘सावरकर: द ट्रू स्टोरी आफ द फादर आफ हिंदुत्व’ और ‘बाल ठाकरे एंड द राइज आफ द शिव सेना’ जैसी पुस्तकों के रचयिता पुरंदरे ने अपनी ताजा कृति के माध्यम से पाठकों को इतिहास के एक महत्वपूर्ण कालखंड को नई दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित किया है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और हिटलर के रिश्तों के साथ ही वहां रह रहे दूसरे भारतीयों के अनुभवों को भी शामिल किया गया है। अपने शोध से पुरंदरे यह प्रमाणित करने में सफल रहे हैं कि नेताजी एवं अन्य भारतीयों के तमाम प्रयासों के बावजूद हिटलर ने कभी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन नहीं दिया। यहां तक कि ‘माइन काम्फ’ में भारत के बारे में अपमानजनक टिप्पणियों को हटाने के अनुरोध को भी निष्ठुरता के साथ ठुकरा दिया। हिटलर मानता था कि अंग्रेजों को भारत पर राज करने का अधिकार है, क्योंकि वे भारतीयों के मुकाबले श्रेष्ठ हैं और उनकी सामरिक ताकत भी ज्यादा है। दरअसल, हिटलर रूस को उसी तरह से अपना उपनिवेश बनाना चाहता था जैसे ब्रिटेन ने भारत को बनाया था।